मैं कौन हूँ आखिर
अस्तित्व तो जरुर है
लेकिन क्या कोई वजूद है मेरा
नहीं, और कभी यह मतलब परस्त दुनिया होने भी नहीं देगी
तो फिर बिना वजूद के इस अस्तित्व का क्या कोई आशय है
मेरे लिए नहीं लेकिन संसार के लिए है
जब चाहे मुझे रोंद कर आगे बढ़ सकता है
जब चाहे मुझे सिड़ी समझ सकता है
लेकिन मैं कभी उसे दोषी नहीं समझती
आखिर मैं उसकी जननी हूँ
उसकी अर्धांगिनी हूँ
लेकिन क्या वो यह समझता है
क्या वो मुझे मेरा वजूद दे सकता है
कभी नही तो फिर मैं इतनी उदार कैसे हूँ
क्यूंकि मैं एक नारी हूँ,
जिसका सदाचार, सहनशील ही परम गुण है
लेकिन नारी को इस तरह कुचलना क्या यथार्थ है
यह प्राणी भूल गये हैं
नारी भी कभी दुर्गा का रूप धर सकती है
मैं अगर शांति का प्रतीक हूँ ,
मैं विनाश का चिन्ह भी हो सकती हूँ
मैं अपने वजूद की तलाश में हूँ
यह तलाश कितनी लम्बी है कोई नहीं जानता
क्यूंकि कोई इसकी जरुरत को समझना नहीं चाहता
मैं हर जगह से लहूलुहान हूँ
इस तपती रेगिस्तान में तड़पती हूँ
बस एक आशा की किरण है
कभी तो मैं अपना वजूद हांसिल कर पाऊँगी
कभी मैं भी अपना आप साबित कर सकुंगी
लेकिन उसके पहले है
एक लम्बा इंतज़ार बस इंतज़ार


2 comments:
oho sushma ji se kam nahi lag rhi ho
bilkul kalawati ji ki takkar ki ban gyi ho lag rha hai :-)
Awesome.. very well written.. Really nice.. :)
Post a Comment