Monday, February 1, 2010
एक अनसुलझी पहेली
एक अनसुलझी पहेली हूँ मैं
हर रात की सहेली हूँ मैं
मैं नहीं जानती मैं कौन हूँ
बस एक अनकही कहानी हूँ मैं
जिंदगी के हर मोड़ पर अकेले है चलना
दुनिया के सारे दस्तूरों को है निभाना
सब जानते हुए भी नहीं पता क्या ऐसा है
हर जगह खुद को तलाशता नजरिया है
गिला नहीं है किसी बात का मुझे
मिला सब कुछ है मेरे खुदा से मुझे
तब क्यूँ एक कमी सी लगती है यहाँ
भीड़ में भी तन्हाई सी महसूस होती है यहाँ
अपने आप को धुन्ध्ते हुए कहीं खो जाती हूँ मैं
साहिल में डोलती हुई कश्ती लगती हूँ मैं
ऐसा लगता है कोई मुझे समझना नही चाहता है
फिर दुसरे पल लगता है मुझे किसको समझाना है
एक बंद किताब की तरह हूँ मैं
या शायद एक अनसुलझी पहेली हूँ मैं
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


6 comments:
wow yaar
really awesome...
tu kabse itni serious ho gayi hai :P
hehehe
still a very nice POEM dear...
are yar its gr8...lagta hi nahi ki tune likhi hai..very thought provoking...bahut hi mast hai yar ..gud one yar...keep it up..
sahi yar
bt smthngs need to be changed
u r nt "ek unsuljhi paheli"
u r fatuuuuuuuuu
hahahhahahahhahahahhaha
vase thek thak likh leti ho
keep it gng....
gr888 adu
mujhe to pata hi nahi tha ki tum bhi likh sakti ho
aur vo bhi itna achha ...
m surprised !!!
Keep it up...
hey thanx all for ur appreciation.. :)
gooddddddddddd
Post a Comment