Thursday, March 8, 2012

पतझड़........

उजड़ा उजड़ा सा है समां अब,
पतझड़ सा है हर मौसम अब,
जाने कहाँ ख़ुशी खो गयी,
जाने कहाँ होटों की हंसी रह गयी,
आँखों में नमी कब से बरक़रार है,
हर सांस में दर्द शिद्दत से विराजमान है,
सब कुछ धुंधला सा लगता है,
तपती रेत में पानी की खोज सा लगता है,
जाने कब से इन आँखों में नींद नहीं,
जाने कब से इस आत्मा को चैन नहीं,
उजड़ी हुई सी दुनिया लगती है,
हर दिशा से ख़ामोशी सुनाई देती है,
कल तक जहाँ हंसी का सावन था,
आज वहीँ आंसुओं का डेरा है,
दुनिया से रिश्ता टूटा सा लगता है,
हर दिल एक अलग ही गम से भरा लगता है,
फिर क्यूँ यह दर्द अपनी हद से बाहर है,
फिर क्यूँ हर सांस एक कर्ज सी है,
हर आहट में तेरा एहसास है,
हर चेहरे में तेरा अक्स है,
आस अभी भी है बहार की,
इस तपती रेत में छाँव की,
इंतज़ार ही है करना अब,
पतझड़ सा है हर मौसम अब||