Saturday, April 17, 2010

वजूद की तलाश ..........


मैं कौन हूँ आखिर
इस वह्शी दुनिया में क्या कोई अस्तित्व है मेरा
अस्तित्व तो जरुर है
लेकिन क्या कोई वजूद है मेरा
नहीं, और कभी यह मतलब परस्त दुनिया होने भी नहीं देगी
तो फिर बिना वजूद के इस अस्तित्व का क्या कोई आशय है
मेरे लिए नहीं लेकिन संसार के लिए है 
जब चाहे मुझे रोंद कर आगे बढ़ सकता है
जब चाहे मुझे सिड़ी समझ सकता है 
लेकिन मैं कभी उसे दोषी नहीं समझती 
आखिर मैं उसकी जननी हूँ
उसकी अर्धांगिनी हूँ 
लेकिन क्या वो यह समझता है 
क्या वो मुझे मेरा वजूद दे सकता है
कभी नही तो फिर मैं इतनी उदार कैसे हूँ
क्यूंकि मैं एक नारी हूँ,
जिसका सदाचार, सहनशील ही परम गुण है
लेकिन नारी को इस तरह कुचलना क्या यथार्थ है
यह प्राणी भूल गये हैं
 नारी भी कभी दुर्गा का रूप धर सकती है
 मैं अगर शांति का प्रतीक हूँ , 
मैं विनाश का चिन्ह भी हो सकती हूँ 
मैं अपने वजूद की तलाश में हूँ 
यह तलाश कितनी लम्बी है कोई नहीं जानता
क्यूंकि कोई इसकी जरुरत को समझना नहीं चाहता 
मैं हर जगह से लहूलुहान हूँ 
इस तपती रेगिस्तान में तड़पती हूँ
बस एक आशा की किरण है 
कभी तो मैं अपना वजूद हांसिल कर पाऊँगी
कभी मैं भी अपना आप साबित कर सकुंगी 
लेकिन उसके पहले है 
एक लम्बा इंतज़ार बस इंतज़ार

Thursday, April 15, 2010

जिंदगी .... एक यात्रा या.....??

जिन्दगी क्या है
शायद एक लम्बी यात्रा 
दुसरे पल लगा नहीं एक पहेली है
फिर लगा नहीं दूसरों के हाथ की कठपुतली है
हाँ शायद यही है जिंदगी
जहाँ अपना कोई अस्तित्व नही है 

जहाँ हर ख़ुशी दूसरों की मोहताज़ है 
आखिर यह दुसरे हैं कौन
हमें अपनी उँगलियों पर नाचने वाले यह होते कौन हैं

क्या वो जिन्हें हम खुद इतना हक देते हैं 
या वो जो खुद सिरमोर बन जाते हैं
इसमें दोष किसका है हमारा या उनका
जिंदगी के इस सूनेपन का कसूर किसका है 
हमारा है और यही गूढ़ रहस्य है 
आखिर हम इतने सदाशय क्यूँ हैं
अपनी छोटी छोटी खुशियों की बागडोर क्यूँ किसी को देते हैं
शायद यह बात लोग समझना नही चाहते हैं
या फिर स्वीकार करने से कतराते हैं ..
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यह जिंदगी तुम्हारी है ...
हर ख़ुशी का अधिकार तुम्हारा है
जिंदगी को क्या बनाना है
इसका निश्चय तुम करोगे कोई और नहीं
यह जिंदगी बहुत ही खुबसूरत बहुत ही प्यारी है
इसे एक यादगार यात्रा बनाओ
न की दूसरों के हाथ की कठपुतली ....
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